Wednesday, October 22, 2008

मै हूँ आनाड़ी

सुन री सखी मै क्या कहू
मै भावरा तू बावरी
जिस जगह देखू बाग में फूलो से सजी हर क्यारी
किस डाल पर मै लटकू ना समझ सका मै आनाड़ी
कोयल सी मीठी सब बोले
जब काम हो अपनी बारी
और कौवे सा करकस तब बोलें
जब आवे अपनी बारी
मैंने देखा सूरज को उगते
तो स्वर्ण किरण लागे प्यारी
वही सूरज जब ढलने जावे
तो दिखे रक्त से भरी क्यारी
सच है कया है झूठ है क्या
अपना कौन पराया क्या
मिथ्या क्या सच है क्या
मै सोच रहा बरी बरी
बस इतनी सी पहेली बुझादे तू
उलझी सी लड़ी सुलझादे तू
तू मेरी सखी मेधा प्यारी
ना जान सका ना समझ सका
अब तक भी, मै हूँ आनाड़ी